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मुख्यमंत्री द्वारा सत्ता को अपने तक सेन्टरलाईज करने के कारण असंतोष का गुबार फूटा
July 25, 2020 • ।अशफाक कायमखानी।


जयपुर।
               मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने हमेशा अपने आपको मिले राजनीतिक पद को बचाये रखने के लिये वो सबकुछ कांग्रेस के नाम पर संघर्ष का दिखावा किया जो उनको कभी भी नही करके केवल कांग्रेस को बचाये रखने के लिये करना चाहिए था। जो गहलोत को करना चाहिये था वो सबकुछ आज तक नही किया। कयोकि कांग्रेस ने उनको बहुत कुछ आज तक दिया जो सबकुछ मिलना उनके लिये मुश्किल था।
             अशोक गहलोत द्वारा दिल्ली मे मोजूद कांग्रेस हाईकमान के एक परिवार मेनेजमेंट के कारण उनकी बात को तरजीह अक्सर मिलती रही है। एवं केंद्र मे अधिकांश समय कांग्रेस की सरकार रहने के चलते उनके मात्र दिल्ली मेनेजमेंट के कारण उनकी चाहत को तरजीह मिलते रहने से उन्होंने प्रदेश मे अपने राजनीतिक उदय के बाद से लेकर अब तक एक एक करके उन सभी मजबूत लीडरशिप को राजनीतिक तौर पर पहले कमजोर व फिर सियासत से बाहर का रास्ता दिखाने मे कभी भी किसी तरह से चूक नही की। लेकिन अब हालात जरा बदले बदले नजर आये।
         कांग्रेस हाईकमान ने मुख्यमंत्री गहलोत को राजस्थान के मुख्यमंत्री रहते आम विधानसभा चुनाव लड़ने के लिये दो दफा 2003-व 2013 मे पुरी छूट देकर मैदान मे उतारने पर कांग्रेस ओंधे मुहं आकर गिरी। फिर रसातल मे पहुंची कांग्रेस को अन्य नेताओं ने अगले चुनाव मे पेंदे से निकाल कर टोप पर लेकर सत्ता के करीब लाये तो फिर हाईकमान मेनेजमेंट के चलते गहलोत फिर मुख्यमंत्री पद पर आ बेठे, जिसके कारण फिर अगले चुनाव मे कांग्रेस रसातल मे पहुंच गई ओर अब अगर यही  हाल रहा तो आगे कभी भी राजस्थान मे होने वाले चुनाव मे मुख्यमंत्री पद पर गहलोत के रहते चुनाव हुये तो कांग्रेस मात्र चार-पांच सीट मुश्किल से ला पायेगी। 
            नेतृत्व के मुद्दे पर मुख्यमंत्री गहलोत व पायलट खेमे मे बंटे कांग्रेस विधायको को दोनो नेताओं द्वारा अलग अलग रुप से अलग अलग जगह होटल्स मे एक तरह से उनकी आजादी के खिलाफ बंधक की तरह रखने का चाहे नेता कितने ही बचाव करे पर जनता मे संदेश उनसे उलटा ही जा रहा है। इसके साथ मुख्यमंत्री द्वारा केवल मात्र अपना मुख्यमंत्री पद बचाये रखने के लिये कांग्रेस को बचाने का दिखावा कर रहे गहलोत को याद रखना होगा कि अवल तो केंद्र मे वर्तमान मे उनकी मनचाही कांग्रेस सरकार नही है एवं ना ही वीपी सिंह-देवेगौड़ा व वाजपेयी के नेतृत्व वाली बहुदलीय बहुमत वाली कमजोर व नाहि उनकी तरह राजनीतिक वसूलो पर चलने वाली सरकार है। अब मोजुदा केंद्र सरकार का स्वरूप व आचरण कैसा है यह गहलोत को ध्यान मे रखना चाहिए था।
               हालांकि पहले भी अनेक मोको पर साबित होता रहा है कि मुख्यमंत्री गहलोत की गांधीवादी छवि वास्तविकता के खिलाफ केवल मात्र कथित तौर पर बनाने की कोशिशें की जाती रही है। पीछले दिनो से पल पल राजस्थान मे घटते राजनीतिक घटनाक्रमो को देखकर तो लगता है कि गहलोत की जो छवि बनाने की आज तक कोशिशे की जाती रही थी वास्तव से वो उनसे कोसो दूर थे। अपने ही उपमुख्यमंत्री से ढेढ साल तक वार्ता ना होना फिर उसी उपमुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते उनके साथ काम करते रहने के बावजूद उसको नकारा व निकम्मा तक बताना मुख्यमंत्री का असली स्वरूप उभर कर सामने आना बताया जा रहा है।
             अंग्रेज राज के समय के बने देशद्रोह का काला कानून जिसके खिलाफ कांग्रेस ने उसे अपने घोषणा पत्र मे हटाने का वादा करके वोट मांगकर सरकार बनाने के बाद मुख्यमंत्री गहलोत ने उसी कानून की दफा 124-A का इस्तेमाल अपने साथी कांग्रेस विधायकों व नेताओं के खिलाफ करने से उनकी कथित तौर पर बनाई जा रही गांधीवादी छवि के खिलाफ व अपना मुख्यमंत्री पद को बचाने को एक मात्र माना जा रहा है। जबकि कांग्रेस के लिये संकट की उक्त घड़ी मे गहलोत को कांग्रेस हित मे स्वयं आगे आकर हाईकमान को कहना चाहिये था कि अब सरकार व दलीय स्तर पर जारी असंतोष के चलते मुख्यमंत्री पद को त्याग रहे है एवं कांग्रेस हित मे किसी अन्य उपयुक्त नेता को मुख्यमंत्री बनाये।
            मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा समर्थक विधायको को साथ लेकर राजभवन मे जाकर धरना-प्रदर्शन व नारेबाजी करके एक गलत परम्परा की नीवं डालने व राजभवन को जनता द्वारा घेरने व उसकी सुरक्षा से अपने आपके मुख्यमंत्री व ग्रहमंत्री होने के बावजूद जो बोल बोले उनसे जनता मे अलग तरह का संदेश जाने के अलावा सरकार व राजभवन के मध्य टकराव होने के हालात को जन्म देना माना जा रहा है।
            कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने मुख्यमंत्री पद को बचाने के लिये जो कथित राजनीतिक जंग लड़ रहे है उस जंग मे लगातार अपने ही बूने जाल मे फंसते नजर आ रहे है। अपने ही लोगो के खिलाफ देश द्रोह कानून की दफा 124-ए का उपयोग करने के अलावा राजभवन मे विधायकों द्वारा धरना-प्रदर्शन व नारेबाजी करके गलत परम्परा की शुरुआत करने से उनकी छवि को बडा आघात पहुंचा है।गहलोत को खूद के पद को बचाने की बजाय कांग्रेस को बचाने के लिये आगे आकर खुद को पद से अलग करके सर्वमान्य नेता को मुख्यमंत्री बनाने पर विचार करना चाहिए। अन्यथा सरकार तो जानी है लेकिन कांग्रेस भी रसातल मे पहुंच सकती है। मुख्यमंत्री की जीद के चलते राजस्थान मे पल पल घटते घटनाटक्रमो को देखर प्रदेश राष्ट्रपति शासन लगने की तरफ बढ चुका है।