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मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कुशल रणनीति को अन्य नेता समझ नही पाये। - 1998 मे गहलोत के मुख्यमंत्री के रुप मे उदय होने के बाद एक एक करके अन्य नेता पस्त होते जा रहे है।
July 3, 2020 • ।अशफाक कायमखानी।


जयपुर।
              राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अचानक 1998 मे मुख्यमंत्री बनने के बाद आज तक जब जब प्रदेश मे कांग्रेस की सरकार बनी है तब तब गहलोत ही मुख्यमंत्री बने है। इसके अलावा गहलोत की राजनीतिक चतुराई के सामने धीरे धीरे एक एक करके दिग्गज व जातीय आधार वाले मजबूत राजनेता धाराशायी होते चले गये। आज राजस्थान मे कांग्रेस पोलिटिक्स मे मजबूत जातीय बेश का एक भी नेता नही बचा है। कमोबेश कोई जातीय बेश का नेता है तो माली जाती बेश का नेता स्वयं मुख्यमंत्री गहलोत को ही मान सकते है। जो अपने उन अधीकांश जातीय मतो के सहारे पार्टी के अंदर के विरोधी नेताओं का बैंड बजवा देते या फिर हितेषी की नेया पार लगवा देते है।
            मुख्यमंत्री अशोक गहलोत सत्ता मे रहे या सत्ता के बाहर लेकिन उनका कांग्रेस संगठन के अलावा एक अलग से प्रदेश के कोने कोने मे सुचना व हितैषी तंत्र कायम रहता है। जो तंत्र हरदम हरकत मे रहकर गहलोत के खिलाफ व पक्ष मे होते राजनीतिक षडयंत्र व प्लान पर नजर रखकर समय रहते उन्हें अवगत करवाने मे रेडी रहते है। गहलोत के राजनीतिक, समाजिक व जनरल स्तर पर प्रदेश भर मे कायम सुचना तंत्र के वर्कर का गहलोत भी सत्ता मे आने पर विशेष ध्यान रखते है। वो पुरी कोशिश करते है कि जायज तरीको से उन्हें आर्थिक लाभ होता रहे।
             उक्त सूचना तंत्र मे काम करने वालो मे मुख्यमंत्री के विश्वासी लोगो को या उनके परिवार जनो को बाकायदा नियमानुसार उनकी योग्यता स्तर के हिसाब से स्टेट व जिला कंज्यूमर कोर्ट, ट्रिब्यूनल व विभिन्न बोर्ड-निगम एवं समितियों मे एडजस्ट किया जाता है। जहां उन्हे वेतन या भत्ते के तौर पर अच्छा खासा माहना मिलता रहे। ऐसी जगह तीन मे से एक या पांच मे से दो सदस्य मुख्यमंत्री के विश्वास वाले वर्कर ऐपोंईट हो जाते है तो उनके कारण राजनीतिक भूचाल भी नही मचता है। वही ऐसे लोग आर्थिक रुप से टूट भी  नही पाते है।
             कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विधायको को अपने अपने क्षेत्र का दिखते तौर पर हमेशा बादशाह बनाकर मस्त रखा है। वही अपने विश्वास के लोगो का भी विशेष ध्यान रखकर उन्हें हमेशा अपने साथ जोड़े रखा है। जिस जिस खांचे मे बीना किसी राजनीतिक धमाचौकड़ी किये अपने खास लोगो को एडजस्ट किया जा सकता है वहां वहाँ मुख्यमंत्री उनको एडजस्ट करते आये है। तभी बीना किसी मजबूत राजनीतिक जातीय आधार के बावजूद अशोक गहलोत तीसरी दफा मुख्यमंत्री बन पाये है। प्रदेश के कोने कोने मे विश्वासी लोगो को बीना राजनीतिक विवाद पैदा किये जोड़े रखने की अशोक गहलोत की कला के सामने राजस्थान के बाकी नेता काफी बोने नजर आते है। गहलोत की इसी राजनीतिक चतुराई व रणनीति के कारण प्रदेश मे उनका 1998 मे मुख्यमंत्री के रुप मे उदय होने के बाद दुसरा कोई उनके बराबर का नेता अभी तक बन नही पाया है।