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बाँदा के गाँधी यानी जमुना प्रसाद बोस को अपने जीवन की सहेजने के लिए करनी पड़ रही है जिद्दोजहद
June 21, 2020 • रिज़वान रज़ा

लखनऊ :: एक शख़्सियत जिसने जंग ए आज़ादी का वह दौर देखा। जो आज़ादी के बाद सूबे की सत्ता का सितारा रहा। जिनकी ईमानदारी और वैचारिक चिंतन आज भी उस दौर की याद दिलाती जो समय के चक्र में कहीं गुमशुदा हो गया। सत्ता और राजनीति का एक ऐसा पहरेदार जिसकी ईमानदारी की मिसाल आज भी लोग देते है। 

हम बात कर रहे हैं बाँदा के गाँधी यानी जमुना प्रसाद बोस की। जिनकी सादगी और ज़िंदादिली ही उनकी पहचान है। खादी का कुर्ता और धोती जिनका पहनावा है। विचारों में जिनके महात्मा गाँधी और डॉ लोहिया का चिंतन समाहित है। ऐसी शख्सियत जो देश और समाज की आँखों से ओझल होता जा रहा है। 

आज 94 वर्षीय वह राष्ट्रभक्त स्वतंत्रता सेनानी एवं लोकतंत्र सेनानी अपने जीवन की सहेजने की जिद्दोजहद कर रहा है।

राजधानी लखनऊ के लारेंस टैरिस स्थित अपने आवास पर श्री बोस जी बीमारी और वृद्धावस्था की मार झेल रहे हैं। बीते 20 फरवरी को श्री बोस जी बाँदा स्थित अपने घर के बाथरूम में कपड़े धुलते हुए फिसल कर गिर जाने की वजह से दाएं कुल्हा की हड्डी टूट गई। जिसका लखनऊ के डॉ राममनोहर लोहिया में आपरेशन होना था। अस्पताल के डॉक्टर ने यह कह कर भर्ती करने से मना कर दिया क्योंकि उनकी उम्र ज्यादा है। फिर श्री बोस जी के बेटे दिनेश जी ने एक निजी अस्पताल में उनके कूल्हे की शल्य क्रिया कराई। कुछ समय बाद वह लॉरेंस टैरिस स्थित अपने आवास पर पहुंच गए। 

लॉरेंस टैरिस का वह आवास किसी राजनेता का ठिकाना नही है। बल्कि यह वह बसेरा है जहाँ एक गांधीवादी चिंतक अपने जीवन के कई दशक बिता चुका है। साधारण रहन सहन, एक खाट, वाकर और चंद किताबें ही उनके जीवन के अंतिम साथी है। मुफलिसी नही बल्कि वक्त की मार ने इस हिमालय की चट्टान को पिघला दिया है। जिन्होंने 42 के आंदोलन में अंग्रेजों से लोहा लिया। जो नेताजी सुभाष के प्रिय रहे। जिन्होंने डॉ लोहिया से समाजवाद का ककहरा सीखा। वह आज भी उन पुरानी यादों को याद करके भावुक हो जाते है। 

वक्त की मार लॉरेंस टैरिस का वह घर भी झेल रहा है। जहां की छत पूरी तरह जर्जर और जीर्ण छीर्ण हो गई है। बारिश में छत से पानी की धार बहती है। सारा कमरा जलमग्न हो जाता है। बोस जी बताते है कि वह बस हाथ जोड़कर ईश्वर से प्रार्थना करते है कि इस बार कुछ कम बारिश हो। 

बोस जी यह भी बताते है कि मेरी उम्र 94 वर्ष की है। जिस अस्पताल में मेरे कूल्हे का आपरेशन हुआ। वहां आपरेशन का खर्च दो लाख बता कर बिल घर पर भिजवा दिया है। अब रोज रोज फोन करके परेशान कर रहे है। यही नही जिस चिकित्सक ने मेरा आपरेशन किया वह मेरा फोन भी नही उठाता है। जब भी मुझे असहनीय पीड़ा होती है या कोई अन्य परेशानी होती है तो वह चिकित्सक फोन नही उठता। अस्पताल में बात करता हूँ तो वहाँ बताते है कि कोरोना के चलते 65 वर्ष की उम्र से ज्यादा के व्यक्ति का अस्पताल आने पर पाबंदी है। आपकी उम्र बहुत ज्यादा है आप घर ही रहिए। 

ऐसे में कुछ दिन पूर्व जब बाराबंकी के Rajnath Sharma बोस जी का कुशल क्षेम लेने पहुंचे तो वह अपनी पीड़ा बताने लगे। राजनाथ शर्मा जी ने फौरन दिल्ली के सुप्रसिद्ध आर्थोपेडिक सर्जन डॉ Akhilesh Yadav की बोस जी से बात कराई। डॉ अखिलेश जी ने उन्हें आस्वस्त किया कि आप किसी भी वक्त फोन कर सकते है। यह मेरा सौभाग्य होगा कि देश की इतनी बड़ी शख्सियत की सेवा कर सकूँ। आप देश की धरोहर है। आपको स्वस्थ करना मेरा ध्येय है। 

मेरी ईश्वर से प्रार्थना है कि बोस जी जैसी विभूति को जल्द स्वस्थ करे। देश व समाज को उनकी बहुत जरूरत है। बोस जी समाजवाद उस परम्परा के अंतिम व्यक्ति है जो कड़ी महात्मा गाँधी और डॉ लोहिया को जोड़ती है।